द्वितीय इतिहास 06
सुलैमान की प्रार्थना
12 और वह इस्राएल की सारी मण्डली के साम्हने यहोवा की वेदी के साम्हने खड़ा हुआ, और अपने हाथ फैलाए।
13 क्योंकि सुलैमान ने पांच हाथ चौड़ी, और तीन हाथ ऊंची धातु की एक नींव बनाई, और उसे आंगन के बीच में खड़ा किया, और उस पर खड़ा होकर इस्राएल की सारी मण्डली के साम्हने घुटने टेककर, और अपने हाथ आकाश की ओर फैलाए।
14 और उस ने कहा, हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, तेरे तुल्य कोई परमेश्वर नहीं है, न स्वर्ग में और न पृथ्वी पर; जो तेरे दासोंके लिथे जो अपके सम्पूर्ण मन से तेरे साम्हने चलते हैं, वाचा का पालन करता है, और उन पर करूणा करता है;
15 जो वचन तू ने अपके दास मेरे पिता दाऊद से कहा या, उसको तू ने माना है; क्योंकि तू ही ने अपके मुंह से कहा या, और अपके ही हाथ से वैसा ही किया, जैसा आज के दिन प्रगट होता है।
16 इसलिये अब हे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा, अपने दास मेरे पिता दाऊद के उस वचन को पूरा कर, जो तू ने कहा या, कि मेरे आगे से इस्राएल की गद्दी पर विराजनेवाला तेरे वंश में कभी न घटेगा; केवल यह कि तुम्हारे बच्चे मेरी व्यवस्था पर चलते हुए उसी प्रकार चलते रहें, जिस प्रकार तुम मुझ से पहिले चलते थे।
17 और अब, हे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा, जो वचन तू ने अपके दास दाऊद से कहा या, वह सत्य हो जाए।
18 परन्तु क्या परमेश्वर सचमुच मनुष्योंके साय पृय्वी पर निवास करेगा? देखो, स्वर्ग और स्वर्ग का स्वर्ग भी तुम्हें नहीं समा सकता, फिर इस भवन को जो मैं ने बनाया है, तुम में क्या समाएगा?
19 इसलिये हे मेरे परमेश्वर यहोवा, अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुन, कि जो दोहाई और प्रार्थना तेरा दास तेरे साम्हने करता है, उसे तू सुन सके।
20 तेरी आंखे इस स्यान की ओर दिन रात खुली रहें, जिसके विषय में तू ने कहा, कि तू यहां अपना नाम रखेगा, कि जो प्रार्यना तेरा दास इस स्यान में करता है वह सुन ले।
21 इसलिथे अपके दास और अपक्की प्रजा इस्राएल की गिड़गिड़ाहट जो वे इस स्यान में करते हैं सुनो, और अपके निवासस्थान अर्यात् स्वर्ग में से सुनो, इसलिथे सुनो और झमा करो।
22 जब कोई अपने पड़ोसी के विरूद्ध पाप करे, और उसे शाप देने की शपथ खाए, कि आप स्वयं शाप दे, और शाप की शपथ इस भवन में तेरी वेदी के साम्हने खाए,
23 तो तू स्वर्ग में से सुनकर काम करना, और अपने दासोंका न्याय करना, और दुष्टोंको बदला देना, और उसके सिर पर उसकी चाल चलाना, और धर्मी को धर्मी ठहराना, और उसके धर्म के अनुसार बदला देना।
24 जब तेरी प्रजा इस्राएल तेरे विरूद्ध पाप करने के कारण शत्रु से हार जाए, और वे फिरकर तेरे नाम को मानें, और इस भवन में तेरे साम्हने प्रार्थना और गिड़गिड़ाएं करें,
25 तब तू स्वर्ग में से सुनकर अपनी प्रजा इस्राएल के पाप झमा करना; और उन्हें उस देश में लौटा ले आओ जो तू ने उनको और उनके पुरखाओं को दिया है।
26 जब आकाश बन्द हो जाए, और वर्षा न हो, क्योंकि उन्होंने तेरे विरूद्ध पाप किया है, और इस स्यान में प्रार्थना करें, और तेरे नाम का अंगीकार करें, और तू उनको दु:ख दे, और अपने पापों से फिर जाएं,
27 तब तू स्वर्ग में से सुन, और अपने दासों और अपनी प्रजा इस्राएल का पाप झमा करना, और उनको अच्छे मार्ग पर चलना सिखा; और अपने देश में जो तू ने अपक्की प्रजा को निज भाग करके दिया है उस में जल बरसाना।
28 यदि उस देश में अकाल पड़े, वा मरी फैले, वा गेहूं जले, वा झुलसा वा टिड्डियां, वा इल्लियां, वा उसके शत्रुओं में से कोई उसे उसके फाटकोंके देश में घेरे, वा कोई व्याधि वा कोई रोग फैले,
29 जो कोई मनुष्य वा तेरी सारी प्रजा इस्राएल अपनी अपनी विपत्ति और पीड़ा जानकर प्रार्थना और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करे, और इस भवन की ओर अपने हाथ फैलाए,
30 तब तू स्वर्ग से अर्थात अपने निवास स्थान से आया, और जैसा तू उसके मन को जानता है, वैसा ही एक एक को उसके सारे चालचलन के अनुसार क्षमा करना, और देना (क्योंकि मनुष्यों के मन को तो तुम ही जानते हो)।
31 जिस से वे उस देश में जो तू ने हमारे पुरखाओं को दिया या, जितने दिन तक जीवित रहें, तब तक तुझ से डरते रहें, और तेरे मार्ग पर चलते रहें।
32 इसी प्रकार परदेशी भी जो तेरी प्रजा इस्राएल में से न हो, परन्तु तेरे बड़े नाम, और तेरे बलवन्त हाथ, और बढ़ाई हुई भुजा के कारण दूर देश से आता हो, वह इस भवन में आकर प्रार्थना करें,
33 तब तू अपने निवासस्थान में से सुनना, और जो परदेशी तुझ से विनती करे उसके अनुसार करना; जिस से पृय्वी के सब कुल के लोग तेरा नाम जान लें, और तेरी प्रजा इस्राएल के समान तेरा भय मानें; और वे जान लें कि यह भवन जो मैं ने बनाया है, वह तेरे ही नाम से कहलाता है।
34 और जब तेरी प्रजा के लोग जिस मार्ग से तू उनको भेजता है उस मार्ग से अपने शत्रुओं से लड़ने को निकलें, और इस नगर की ओर से जिसे तू ने चुन लिया है, और इस भवन को जो मैं ने तेरे नाम के लिथे बनाया है, तुझ से प्रार्थना करें,
35 तब स्वर्ग से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनो, और उनका हक़ पूरा करो।
36 जब वे तेरे विरुद्ध पाप करें (क्योंकि ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो पाप न करता हो), और तू उन पर क्रोधित हो, और उन्हें शत्रु के वश में कर दे, कि जो उन्हें वश में कर लें, वे उन्हें बन्धुआ करके किसी दूर या निकट देश में ले जाएं,
37 और जिस देश में वे बन्धुवाई में पहुंचाए जाएं, उस देश में वे होश में आएंगे, और फिरेंगे, और अपने बन्धुवाई के देश में वे तुझ से बिनती करके कहेंगे, हम ने पाप किया है, और दुष्टता की है, और दुष्टता ही की है;
38 और यदि वे अपके बंधुआई के देश में जिस में वे बन्धुआई करके गए थे, अपके सारे मन और अपके सारे प्राण से तेरे पास फिरें, और अपके देश के उस भाग के लिथे जो तू ने उनके पुरखाओंको दिया या, और इस नगर के लिथे जिसे तू ने चुन लिया या, और इस भवन के लिथे जिसे मैं ने तेरे नाम के लिथे बनाया या प्रार्यना करें,
39 तब तू स्वर्ग में से जो अपने निवास में है, उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना, और उनका हक़ पूरा करना; और अपनी प्रजा के लोगों को, जिन्होंने तुम्हारे विरूद्ध पाप किया है, क्षमा करो।
40 इसलिये अब, हे मेरे परमेश्वर, अपनी आंखें खुली रखें, और अपने कान इस स्यान की प्रार्थना पर ध्यान लगाते रहें।
41 इसलिये हे यहोवा परमेश्वर, तू अपके बल के सन्दूक समेत अपके विश्राम में उठ; हे परमेश्वर यहोवा, तेरे याजक उद्धार का वस्त्र पहिने, और तेरे पवित्र लोग भलाई के कारण आनन्द करें।
42 ओह! हे प्रभु परमेश्वर, अपने अभिषिक्त से अपना मुख न मोड़; अपने दास दाऊद की करूणा को स्मरण रख।
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