द्वितीय इतिहास 03
दो करूब
10 और उस ने पवित्र भवन में फर्श के समान दो करूब बनाए, और उन्हें सोने से मढ़ा।
11 और करूबोंके पंखोंकी लम्बाई बीस हाथ की हुई; उनमें से एक का पंख पाँच हाथ लम्बा था, और वह भवन की दीवार से छू गया; और दूसरा पंख पाँच हाथ लम्बा था, और वह दूसरे करूब के पंख को छूता था।
12 और दूसरे करूब का पंख पांच हाथ लम्बा था, और वह भवन की भीत से सटा हुआ था; दूसरा पंख भी पांच हाथ लम्बा था, और वह दूसरे करूब के पंख से जुड़ा हुआ था।
13 और उन करूबों के पंख बीस बीस हाथ फैले हुए थे, और वे सीधे खड़े थे, और उनका मुख भवन की ओर था।
14 और उस ने परदे को नीले, बैंजनी, लाल और सूक्ष्म सनी के कपड़े का बनाया; और उस पर करूब रखे।
15 और उस ने भवन के साम्हने पैंतीस हाथ ऊंचे दो खम्भे बनाए; और प्रत्येक के ऊपर जो राजधानी थी, वह पांच हाथ की थी।
16 और उस ने भविष्यद्वाणी की नाईं जंजीरें भी बनाईं, और उन्हें खम्भोंके सिरोंपर लगाया; और एक सौ अनार बनाए, और उनको जंजीरोंके बीच में रखा।
17 और उस ने मन्दिर के साम्हने एक दाहिनी ओर, और दूसरा बाईं ओर खम्भे खड़े कराए; और दाहिनी ओर वाले का नाम याकीन, और बाईं ओर वाले का नाम बोअज़ रखा।
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