द्वितीय इतिहास 35
योशिय्याह ने मिस्र के राजा को भड़काया और मारा गया
20 इस सब के बाद जब योशिय्याह ने भवन तैयार किया, तब मिस्र का राजा नको परात के तट पर कर्कमीश से लड़ने को चढ़ गया, और योशिय्याह उसका साम्हना करने को निकला।
21 तब उस ने दूतोंके पास यह कहला भेजा, हे यहूदा के राजा, मुझे तुझ से क्या काम? जहाँ तक तुम्हारी बात है, मैं आज तुम्हारे विरुद्ध नहीं आता, केवल उस घराने के विरुद्ध जो मुझ से युद्ध करता है, और परमेश्वर ने मुझे फुर्ती करने के लिये कहा, परमेश्वर जो मेरे साथ है, उसका विरोध करने से सावधान रहो, ऐसा न हो कि वह तुम्हें नष्ट कर दे।
22 परन्तु योशिय्याह ने उस से मुंह न मोड़ा, वरन उस से लड़ने को भेष बदला; और उस ने नको की बातें जो परमेश्वर के मुख से निकलीं या न मानीं, परन्तु मगिद्दो की तराई में लड़ने को आया।
23 और धनुर्धारियों ने राजा योशिय्याह पर तीर चलाए; और राजा ने अपने कर्मचारियोंसे कहा, मुझे यहां से ले चलो, क्योंकि मैं बहुत घायल हो गया हूं।
24 और उसके सेवकों ने उसे रथ पर से उतार लिया, और उसके दूसरे रथ पर चढ़ाकर यरूशलेम को ले गए; और वह मर गया, और उन्होंने उसे उसके पुरखाओं की कब्रों में मिट्टी दी; और सारे यहूदा और यरूशलेम ने योशिय्याह के लिये विलाप किया।
25 और यिर्मयाह ने योशिय्याह के विषय में विलाप किया; और आज के दिन तक सब गवैयों और गायकों ने अपने विलाप में योशिय्याह की चर्चा की; क्योंकि उन्होंने उनके लिये इस्राएल में विधि ठहराई; और देखो, वे विलापगीत में लिखे हुए हैं।
26 योशिय्याह के और काम और उसकी भलाई के विषय में, जैसा यहोवा की व्यवस्था में लिखा है।
27 और पहिली और अन्तिम दोनों की सफलताएं देखो, इस्राएल और यहूदा के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखी हैं।
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