नौकरी 03
अय्यूब अपने जन्म को कोसता है और अपनी दुर्दशा पर विलाप करता है
1 इसके बाद अय्यूब ने अपना मुँह खोला और अपने दिन को धिक्कारा।
2 तब अय्यूब ने कहा,
3 वह दिन नष्ट हो जाए जब मैं पैदा हुआ, और वह रात भी नष्ट हो जाए जब कहा गया, 'एक आदमी गर्भ में है!'
4 वह दिन अन्धकारमय हो जाए; और ऊपर से परमेश्वर उसकी परवाह नहीं करता, न ही वह उस पर अपना प्रकाश डालता है।
5 अन्धकार और मृत्यु की छाया उसे अशुद्ध करें; बादलों को उस पर रहने दो; दिन के काले वाष्प उसे डराते हैं!
6 उस रात को अन्धकारमय होने दे, और वह वर्ष के दिनों में आनन्द न करने दे, और न महीनों की गिनती में प्रवेश करने दे!
7 आह! वह रात एकाकी हो और उसमें मधुर संगीत प्रवेश न करे!
8 जो लोग दिन को कोसते हैं, वे उसे कोसें, और जो फूट-फूट कर रोने को तैयार हैं।
9 उनके सांझ के तारे अंधकारमय हो जाएं; वह प्रकाश की प्रतीक्षा करे, और न आये; और भोर की आँखों की पलकें नहीं देखते!
10 क्योंकि उसने गर्भ के द्वार बन्द नहीं किये; न ही उसने मेरी आँखों से थकान छिपाई।
11 क्या मैं गर्भ ही से नहीं मर गया था? और क्या मैं गर्भ से बाहर आते ही प्राण नहीं छोड़ गया था?
12 घुटनों ने मुझे क्यों ग्रहण किया? और स्तन क्यों, ताकि वह दूध पी सके?
13 अब तो मैं लेटकर विश्राम करना चाहता हूं; मैं सो जाऊंगा, और फिर मुझे आराम मिलेगा,
14 पृथ्वी के राजाओं और मंत्रियों के साथ, जिन्होंने उजड़े हुए स्थानों में अपने घर बनाए हैं।
15 या उन हाकिमों के साथ जिनके पास सोना था, जिन्होंने अपने घरों को चाँदी से भर लिया था;
16 या, एक छिपे हुए गर्भपात के रूप में, ऐसी कोई बात नहीं होगी; उन बच्चों की तरह जिन्होंने कभी रोशनी नहीं देखी।
17 वहाँ दुष्ट लोग उत्पात मचाना छोड़ देते हैं; और वहीं थके हुए लोग विश्राम करते हैं।
18 वहां बन्धुआ लोग इकट्ठे विश्राम करते हैं, और परिश्रम करानेवाले का शब्द नहीं सुनते;
19 वहाँ छोटे-बड़े सब रहते हैं, और दास अपने स्वामी से स्वतंत्र रहता है।
20 कंगालों को ज्योति और उदास मनवालों को जीवन क्यों दिया जाता है?
21 जो मृत्यु की बाट जोहते हैं, परन्तु वह आती नहीं, और उसकी खोज में छिपे हुए धन से भी अधिक खोदते हैं।
22 कौन कब्र पाकर आनन्द से उछलता और प्रसन्न होता है?
23 उस मनुष्य को ज्योति क्यों दी गई है जिसका मार्ग छिपा है, और जिस से परमेश्वर ने उसे छिपा रखा है?
24 क्योंकि रोटी से पहले मेरी सांस चलती है; और मेरी कराहें पानी की तरह बहती हैं।
25 क्योंकि जिस बात का मुझे डर था, वही मुझ पर आ पड़ी है; और जिसका मुझे डर था वही मेरे साथ हुआ।
26 मैं कभी चैन से नहीं रहा, न मुझे शान्ति मिली, न मुझे विश्राम मिला; परन्तु मुझ पर मुसीबत आ गयी है।
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