भजन संहिता 119
प्रभु की व्यवस्था की उत्कृष्टता और उसे मानने वालों की खुशी
105-112
105 तेरा वचन मेरे पाँव के लिए दीपक, मेरे मार्ग के लिए उजियाला है।
106 मैंने शपथ खाई है, और मैं उसे पूरा भी करूँगा, तेरे धर्ममय नियमों को मानूँगा।
107 मैं बड़े संकट में हूँ; हे प्रभु, अपने वचन के अनुसार मुझे जिला।
108 मैं तुझ से विनती करता हूँ, मेरे मुँह से स्वेच्छाबलि स्वीकार कर; मुझे अपने नियम सिखा।
109 मेरा प्राण निरन्तर मेरे हाथ में है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूलता।
110 दुष्टों ने मेरे लिये फंदा लगाया है, तौभी मैं तेरे उपदेशों से नहीं भटका।
111 मैं ने तेरी चितौनियों को सदा के लिये अपनी मीरास बना लिया है, क्योंकि वे मेरे हृदय का आनन्द हैं।
112 मैं ने अपना मन तेरी विधियों को सदा, अन्त तक मानने के लिये लगाया है।
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