domingo, 29 de junho de 2025

भजन संहिता 115 प्रभु की महिमा और मूर्तियों की व्यर्थता। केवल ईश्वर पर भरोसा करने का उपदेश

 भजन संहिता 115

प्रभु की महिमा और मूर्तियों की व्यर्थता। केवल ईश्वर पर भरोसा करने का उपदेश


1 हे प्रभु, हमें नहीं, हमें नहीं, परन्तु अपने नाम की महिमा कर, अपनी करुणा और अपनी सच्चाई के कारण।

2 राष्ट्र क्यों कहें, “उनका ईश्वर कहां है?”

3 परन्तु हमारा ईश्वर स्वर्ग में है; वह जो चाहता है, वही करता है।

4 उनकी मूर्तियाँ चाँदी और सोने की हैं, जो मनुष्यों के हाथों की बनाई हुई हैं।

5 उनके पास मुँह तो है, परन्तु वे बोल नहीं सकते; उनके पास आँखें तो है, परन्तु वे देख नहीं सकते;

6 उनके पास कान तो है, परन्तु वे सुन नहीं सकते; उनके पास नाक तो है, परन्तु वे सूँघ नहीं सकते।

7 उनके पास हाथ तो है, परन्तु वे महसूस नहीं कर सकते; उनके पास पैर तो है, परन्तु वे चल नहीं सकते; उनके गले से कोई आवाज़ नहीं निकलती।

8 उनके बनानेवाले और उन पर भरोसा करनेवाले सब उनके समान हों।

9 हे इस्राएल, यहोवा पर भरोसा रखो; वही उनका सहायक और उनकी ढाल है।

10 हारून के घराने, यहोवा पर भरोसा रखो; वही उनका सहायक और ढाल है।

11 हे यहोवा के डरवैयों, यहोवा पर भरोसा रखो; वही उनका सहायक और ढाल है।

12 यहोवा, जिसने हमें स्मरण किया है, आशीष देगा; वह इस्राएल के घराने को आशीष देगा; वह हारून के घराने को आशीष देगा।

13 वह यहोवा के डरवैयों को, चाहे छोटे हों या बड़े, आशीष देगा।

14 यहोवा तुम्हें और तुम्हारे बाद तुम्हारे वंश को भी अधिकाधिक बढ़ाएगा।

15 यहोवा से आशीष पाओ, जिसने आकाश और पृथ्वी को बनाया है।

16 आकाश यहोवा का आकाश है; परन्तु पृथ्वी उसने मनुष्यों को दी है।

17 मरे हुए यहोवा की स्तुति नहीं करते, और न वे जो चुपचाप चले जाते हैं, करते हैं।

18 परन्तु हम यहोवा को अब से लेकर सर्वदा धन्य कहते रहेंगे। यहोवा की स्तुति करो।

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