quarta-feira, 26 de janeiro de 2022

द्वितीय शमूएल 16 एक्वीतोपेल और हूशै अबशालोम को जो सलाह देते हैं

 द्वितीय शमूएल 16

एक्वीतोपेल और हूशै अबशालोम को जो सलाह देते हैं

15 और अबशालोम और सब इस्राएली पुरूष यरूशलेम को आए, और उसके संग अहीतोपेल।

16 और जब दाऊद का मित्र एर्की हूशै अबशालोम के पास पहुंचा, तब हूशै ने अबशालोम से कहा, राजा जय हो, राजा जीवित रहे!

17 परन्तु अबशालोम ने हुसै से कहा, क्या तेरे मित्र पर ऐसी प्रीति है? आप अपने दोस्त के साथ क्यों नहीं गए?

18 और हुसै ने अबशालोम से कहा, नहीं, परन्तु जो यहोवा को चुन ले, और सारी प्रजा और इस्राएल के सब पुरूष, वही मैं रहूंगा, और मैं उसके संग रहूंगा।

19 और इसके सिवा मैं किसकी सेवा करूं? क्या यह उनके बेटे के सामने नहीं हो सकता? जैसे मैं ने तेरे पिता के साम्हने सेवा की, वैसे ही मैं तेरे साम्हने रहूंगा।

20 तब अबशालोम ने अहीतोपेल से कहा, हम आपस में सम्मति दें, कि हम क्या करें।

21 तब अकीतोपेल ने अबशालोम से कहा, अपके पिता की रखेलियोंके पास जा, जिन्हें वह भवन की रखवाली करने के लिथे छोड़ गया है; और सब इस्राएली यह सुनेंगे, कि तू ने अपके पिता के साम्हने अपने आप को घृणित ठहराया है; और जितने तेरे संग हों वे सब के हाथ बलवन्त हो जाएंगे।

22 तब उन्होंने देश में अबशालोम के लिथे एक तम्बू खड़ा किया, और अबशालोम सब इस्राएलियोंके साम्हने अपके पिता की रखेलियोंके पास गया।

23 और अक्वितोपेल की युक्‍ति उन दिनों में ऐसी युक्‍ति थी, मानो परमेश्वर का वचन मान लिया गया हो: दाऊद और अबशालोम को अक्वितोपेल की सारी युक्‍ति ऐसी ही थी।

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