terça-feira, 25 de janeiro de 2022

द्वितीय शमूएल 15 अबशालोम का विद्रोह और दाऊद की उड़ान

 द्वितीय शमूएल 15

अबशालोम का विद्रोह और दाऊद की उड़ान

1 इसके बाद अबशालोम के पास रथ और घोड़े थे, और उसके आगे आगे दौड़ने के लिथे पचास पुरूष थे।

2 बिहान को अबशालोम उठकर फाटक के मार्ग पर खड़ा हो गया। और ऐसा हुआ कि राजा के पास न्याय के लिए आने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने अबशालोम को अपने पास बुलाया, और उससे कहा, तुम किस शहर से हो? और वह कहता है, तेरा दास इस्राएल के गोत्रोंमें से एक है;

3 तब अबशालोम ने उस से कहा, देख, तेरा काम तो अच्छा और ठीक है, परन्तु राजा की ओर से तेरा कोई सुननेवाला नहीं।

4 अबशालोम ने और कहा, आह! काश मैं पृथ्वी पर न्यायाधीश होता! कि हर एक मनुष्य, जिसका कोई मांग वा प्रश्न हो, मेरे पास आए, कि मैं उसका न्याय करूं।

5 यह भी हुआ कि जब कोई उसके पास दण्डवत् करने के लिथे उसके पास जाता, तो वह हाथ बढ़ाकर उसे पकड़कर चूम लेता।

6 और जितने इस्राएली राजा के पास न्याय करने के लिथे आए, उन सब से अबशालोम ने ऐसा ही किया: अबशालोम ने इस्राएलियोंके मन इस प्रकार चुरा लिया।

7 और चालीस वर्ष के बीतने पर अबशालोम ने राजा से कहा, अपक्की मन्नत पूरी करने को जो मैं ने यहोवा से मानी है, मुझे हेब्रोन जाने दे।

8 क्योंकि जब मैं अराम के गशूर में रहता या, तब तेरे दास ने एक मन्नत मानी, कि यदि यहोवा मुझे फिर यरूशलेम को लौटा ले आए, तो मैं यहोवा की उपासना करूंगा। 

9 तब राजा ने उस से कहा, कुशल से जा। सो वह उठा और हेब्रोन को गया।

10 और अबशालोम ने इस्राएल के सब गोत्रोंमें भेदियोंको यह कहला भेजा, कि जब तुम नरसिंगोंका शब्द सुनो, तब कहना, कि अबशालोम हेब्रोन में राज्य करता है।

11 और यरूशलेम से दो सौ निमन्त्रित पुरूष अबशालोम के संग गए, तौभी वे सादगी से चले गए, क्योंकि वे इस विषय में कुछ न जानते थे।

12 और अबशालोम ने गीलोनी अहीतोपेल को दाऊद की परिषद से अपके गीलो नगर में बुलवा भेजा, जब वह अपके मेलबलि चढ़ा रहा या; और षडयंत्र बलवन्त होता गया, और लोग आकर अबशालोम के संग बढ़ते चले गए।

13 तब एक दूत ने दाऊद के पास यह कहला भेजा, कि इस्राएल में से हर एक का मन अबशालोम के पीछे पीछे चलता है।

14 तब दाऊद ने अपके सब कर्मचारियोंसे जो उसके संग यरूशलेम में थे कहा, उठ, हम भाग जाएं, क्योंकि हम अबशालोम के पास से न बच सके। जाने के लिये फुर्ती कर, कहीं ऐसा न हो कि वह फुर्ती करके हम को पकड़ ले, और हम पर विपत्ति डाल दे, और नगर को तलवार से मार डाले। 

15 तब राजा के कर्मचारियोंने राजा से कहा, सुन, तेरे दास यहां हैं, क्‍योंकि जो कुछ हमारा प्रभु राजा ठहराए।

16 और राजा अपके सारे घराने समेत पैदल ही निकल गया, परन्तु दस रखेलियोंको घर की रखवाली करने के लिथे छोड़ गया।

17 सो जब राजा और सब प्रजा के लोग पैदल निकल गए, तो वे दूर एक स्थान पर रुक गए।

18 और उसके सब कर्मचारी, और सब करेती, और सब पलेती, और सब गती, अर्यात् छ: सौ पुरूष जो गत से पैदल आए थे, राजा के साम्हने चले।

19 तब राजा ने गती इत्तै से कहा, तू हमारे संग क्यों चले? लौट जा, और राजा के पास रह, क्योंकि तू परदेशी है, और अपके स्यान को भी लौट जाएगा।

20 कल तू आया था, और क्या मैं आज तुझे अपने साथ ले चलता? क्‍योंकि जहां मैं जा सकता हूं वहां जाना मेरे लिथे सामर्थ है; फिर लौटकर अपके भाइयोंको अपके साथ करूणा और सच्चाई के साथ फिर ले जाना।

21 परन्तु इत्तै ने राजा को उत्तर दिया, कि यहोवा के जीवन और मेरे प्रभु राजा की शपय की शपय जिस स्यान में मेरा प्रभु राजा है, वहां तेरा दास भी निश्चय रहेगा।

22 तब दाऊद ने इत्तै से कहा, इसलिथे आ, और आगे बढ़। तब गती इत्तै, और उसके सब जन, और जितने लड़के उसके संग थे, वे सब निकल गए।

23 और सारा देश ऊँचे शब्द से रोने लगा, और सब प्रजा के लोग उसके पास से होकर चले; और राजा किद्रोन नाले के ऊपर से होकर भी गया, और सब लोग जंगल के मार्ग की ओर चले।

24 देखो, सादोखै भी उसके संग था, और जितने लेवीय परमेश्वर की वाचा का सन्दूक उठाए थे, वे उसके संग थे; और उन्होंने परमेश्वर का सन्दूक वहां रखा; और एब्यातार चढ़ाई करता रहा, और सब लोग नगर से निकल गए।

25 तब राजा ने सादोक से कहा, परमेश्वर के सन्दूक को नगर में लौटा ले आओ; कि यदि उस पर यहोवा की दृष्टि हो, तो वह मुझे वहां फिर ले आएगा, और मैं उसे और उसके निवासस्थान को देखूं।

26 परन्तु यदि मैं योंकहूं, कि मैं तुझ से प्रसन्न नहीं हूं; मैं यहां हूं, मुझे वैसा ही बनाओ जैसा तुम्हारी नजर में सही लगता है।

27 तब राजा ने सादोक याजक से और कहा, क्या तू दशीं नहीं है? इसलिथे अपके दोनों पुत्र अपके संग कुशल से नगर को लौट जाएं, अर्यात् तेरा पुत्र अहीमास, और एब्यातार का पुत्र योनातान।

28 सुन, मैं जंगल के अराबा में तब तक रहूंगा, जब तक मुझे तेरा समाचार न मिले।

29 तब ज़ोदक और एब्यातार परमेश्वर के सन्दूक को यरूशलेम में फेर ले आए, और वे वहीं रहे।

30 और दाऊद जैतून की चढ़ाई पर चढ़ गया, और सिर ढांपे हुए रोता हुआ चढ़ गया; और नंगे पांव चला; और जितने लोग उसके संग गए, सब ने अपना सिर ढांप लिया। और वे बिना रुके रोते हुए ऊपर चले गए।

31 तब दाऊद को यह बताया गया, कि अहीतोपेल भी उन लोगोंमें से है, जिन्होंने अबशालोम से द्रोह की गोष्ठी की है। इसलिथे दाऊद ने कहा, हे यहोवा, अक्वितोपेल की युक्ति को उलट दे।

32 और जब दाऊद चोटी पर परमेश्वर की उपासना करने को आया या, तब क्या देखा, कि अर्काई हूशै अपके वस्त्र फाड़े हुए और सिर पर मैल लिये हुए उस से भेंट करने को आया।

33 दाऊद ने उस से कहा, यदि तू मेरे संग चलकर मेरे लिथे भार ठहरेगा।

34 परन्तु यदि तू नगर को लौटकर अबशालोम से कहे, हे राजा, मैं तेरा दास होऊंगा; जैसा मैं कभी तेरे पिता का दास हुआ करता या, वैसा ही अब भी तेरा दास बनूंगा; तब तू मुझे अक्वितोपेल की सम्मति सुनाएगा।

35 और क्या सादोक और एब्यातार याजक वहां तुम्हारे संग नहीं हैं? और जो कुछ तू राजभवन में सुने, वह सब सादोक और एब्यातार याजकोंको मुझ से प्रगट करना।

36 देखो, उनके संग उनके दो पुत्र भी हैं, अर्थात् सादोक का पुत्र अहीमास, और एब्यातार का पुत्र योनातान; जितनी बातें तुम सुनोगे, उन सभोंकी बातें तुम उन्हीं के हाथ से मेरे पास पहुंचाना।

37 तब दाऊद का एक मित्र हूशै नगर में आया, और अबशालोम यरूशलेम में आया।

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